Wednesday, April 01, 2015

बहता है, बहने दो...


बहता है, बहने दो...

सदियों से सोया था
सांस में पिरोया था
एक शब्द, सहमा सा
जो कहता कहने दो....

ज़ख्म था या सपना था
जो भी था अपना था
यादों के आँचल में
अब सोता, सोने दो...

धूमिल सी आशाएं
टूटी परिभाषाएं
वो आधी बातें अब
आधी ही रहने दो...

कुछ आये, कुछ छूटे
पल बिखरे, पल टूटे
सांस में पिरोई उन
यादों को रहने दो...

3 comments:

sunil deepak said...

बहुत सुन्दर मधुकर जी! सुबह सुबह, आप की कविता के शब्दों ने दिल को छू लिया. धन्यवाद

madhukar said...

धन्यवाद्

Himanshu Sheth said...

मधुकरभाई, भावनाओं और शब्दों का ऐसा सुंदर सुमेल..... कमाल है!