
When I was growing up - late teens/early '20s - I wanted to become a writer - an author, novelist, poet... (that, of course, did not happen... as happens with so many life's grand plans :)...
But I still retains (or just re-discovered) some of those scribblings, which I used to make to capture the ruminations of the protogonist in
imagined lifescapes... here are some of them...
(maybe I will be able to key-in some more :)
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ज़िन्दगी, जैसे ढलान पर उन का एक गोला लुढ़कता जा रहा है, खुलता जा रहा है...
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कभी भी आदमी को उसके घर की दीवारों के अन्दर देखो - वह किसी-ना-किसी रूप में ज़रूर उन दीवारों की अपेक्षाओं में बंधा होगा|... दीवारों की अपनी ही नैतिकता होती है|
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पेड़ों के बीच बहती हुई की सरसराहट जैसी याद...
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कुछ शब्द हैं, जो मैंने आज तक नहीं कहे| पुराने सिक्कों की तरह वे मेरी जेब में पड़े रहते हैं| ना उन्हें फ़ेंक पाता हूँ, ना भुला पाता हूँ|...
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हम दोनों के बीच हमारी निगाहों के अलावा और कोई नहीं था|
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एक निरर्थक सी सार्थकता...
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मुझे ये सोच कर अच्छा लगता है कि हम दोनों एक ही शहर में रहते हैं, एक ही शहर के पत्ते अलग-अलग घरों की सीढ़ियों पर बिखर जाते हैं,... और जब हवा चलती है, तो उसका शोर उसके और मेरे दरवाजों को एक संग खटखटाता है...
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हम दोनों यूँ ही जाने कब से बात करते जा रहे थे| बिना मतलब एक वाक्य से दुसरे वाक्य तक सफ़र करते हुए| ये केवल समय बिताना था - हालांकि जिस बात को कहना था. उसे हम लगातार स्थगित किये जा रहे थे...
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खँडहर... सब बीता हुआ, जिया जा चूका, फिर भी जहाँ का तहां!
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एक याद... जैसे कभी-कभी किताब पढ़ते-पढ़ते हम उलट कर पिछले पन्नों पर एक सरसरी सी निगाह डाल देतें हैं....
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जब कभी हम दोनों अकेले होते हैं.... जब कभी हम एक-दुसरे के संग होते हुए भी अकेले हो जाते हैं....
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हमारी बात फिर वहीँ आ कर अटक गयी थी - बैगाटेल की गोली की तरह, जो चारों ओर घूम-फिर कर एक ही छेद में आ फंसती है...
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दिन के समय इनसे अधिक रौशनी नहीं आती,... जो रौशनी आती है, वह सिर्फ इतनी कि आस-पास का अँधेरा देख लें..
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etc. etc...