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इतना भी तुम सम्हझ न पाए,
मौन अधर भी कहते हैं कुछ...
कविता बन जाती स्मृतियाँ,
चाहे कितनी भी सूखी हों,
बीती ऋतू की लुटी कहानी,
पुस्तक पृष्ठों पर मुरझाये,
सूखे पुष्प सुनाते हैं कुछ...
आड़ी-तिरछी रेखाओं के,
अर्थहीन जले दिखते हैं,
जिनकी लेख नहीं पहचानी,
जिस रहस्य को सम्हझ ना पाए,
अर्थ वहां रहते हैं कुछ...
- 31st march, 1972