Sunday, May 05, 2013
Wednesday, March 20, 2013
एक मैं..और बहुत सी परछाईयां हैं
एक मैं
और बहुत सी परछाईयां हैं
कुछ पुरानी, कुछ नयी परछाईयां हैं ..
और कुछ सहमे हुए से
बादलों की सेज पर
स्वप्न जैसी ये कई परछाईयां हैं
... आज जब गंतव्य में हूँ
खो गया जो सूर्य पश्चिम में पिघलता
याद करता हूँ ..
बहुत परछाईयां थीं, बहुत परछाईयां हैं
खो गयीं कुछ,
कुछ अभी भी ढूंढती रहतीं हैं
मुझको
ढूंढता रहता हूँ मैं उनमे अपने आप को
कुछ पुरानी, कुछ नयी परछाईयां हैं ..
और बहुत सी परछाईयां हैं
कुछ पुरानी, कुछ नयी परछाईयां हैं ..
और कुछ सहमे हुए से
बादलों की सेज पर
स्वप्न जैसी ये कई परछाईयां हैं
... आज जब गंतव्य में हूँ
खो गया जो सूर्य पश्चिम में पिघलता
याद करता हूँ ..
बहुत परछाईयां थीं, बहुत परछाईयां हैं
खो गयीं कुछ,
कुछ अभी भी ढूंढती रहतीं हैं
मुझको
ढूंढता रहता हूँ मैं उनमे अपने आप को
कुछ पुरानी, कुछ नयी परछाईयां हैं ..
Wednesday, February 27, 2013
कौन गाता? कौन गाता?....
It is an exhilerating (and unsettling) feeling when you suddenly got connected to (to use a cliche) a long lost friend, philosopher and guide... when you rediscover a long lost poem by one of your "resident poets" of the time you were growing up, as a teenager.
Today I found/rediscovered this poem by Keshav Prasad Pathak:
Today I found/rediscovered this poem by Keshav Prasad Pathak:
सहज स्वर-संगम, ह्रदय के बोल मानो घुल रहे हैं
शब्द, जिनके अर्थ पहली बार जैसे खुल रहे हैं .
दूर रहकर पास का यह जोड़ता है कौन नाता
कौन गाता ? कौन गाता ?
शब्द, जिनके अर्थ पहली बार जैसे खुल रहे हैं .
दूर रहकर पास का यह जोड़ता है कौन नाता
कौन गाता ? कौन गाता ?
दूर, हाँ,उस पार तम के गा रहा है गीत कोई ,
चेतना,सोई जगाना चाहता है मीत कोई ,
उतर कर अवरोह में विद्रोह सा उर में मचाता !
कौन गाता ? कौन गाता ?
चेतना,सोई जगाना चाहता है मीत कोई ,
उतर कर अवरोह में विद्रोह सा उर में मचाता !
कौन गाता ? कौन गाता ?
है वही चिर सत्य जिसकी छांह सपनों में समाए
गीत की परिणिति वही,आरोह पर अवरोह आए
राम स्वयं घट घट इसी से ,मैं तुझे युग-युग चलाता ,
कौन गाता ? कौन गाता ?
गीत की परिणिति वही,आरोह पर अवरोह आए
राम स्वयं घट घट इसी से ,मैं तुझे युग-युग चलाता ,
कौन गाता ? कौन गाता ?
जानता हूँ तू बढा था ,ज्वार का उदगार छूने
रह गया जीवन कहीं रीता,निमिष कुछ रहे सूने.
भर न क्यों पद-चाप की पद्ध्वनि उन्हें मुखरित बनाता
कौन गाता ? कौन गाता ?
रह गया जीवन कहीं रीता,निमिष कुछ रहे सूने.
भर न क्यों पद-चाप की पद्ध्वनि उन्हें मुखरित बनाता
कौन गाता ? कौन गाता ?
हे चिरंतन,ठहर कुछ क्षण,शिथिल कर ये मर्म-बंधन ,
देख लूँ भर-भर नयन,जन,वन,सुमन,उडु मन किरन,घन,
जानता अभिसार का चिर मिलन-पथ,मुझको बुलाता .
कौन गाता ? कौन गाता ?
- Keshav Prasad Pathakदेख लूँ भर-भर नयन,जन,वन,सुमन,उडु मन किरन,घन,
जानता अभिसार का चिर मिलन-पथ,मुझको बुलाता .
कौन गाता ? कौन गाता ?
Friday, February 22, 2013
लम्हे...
वो छोटे से लम्हे, वो मासूम लम्हे
थकी ज़िन्दगी में, सुहाने से लम्हे
गुज़रते हुए कारवां के वे लम्हे
हंसाते-रुलाते मचलते वो लम्हे
वो आधी कही इक कहानी के लम्हे
पिघलती हुई जिंदगानी के लम्हे
मिलन के वो लम्हे, बिछड़ने के लम्हे
भुलाने के लम्हे, निभाने के लम्हे
कोई आस ले कर लुभाने के लम्हे
कभी खो गए, मिल गए थे जो लम्हे
न जाने कहाँ खो गए थे वो लम्हे
पकड़ से फिसलते गए वो लम्हे
हथेली में ले कर चले चंद लम्हे
फिसलते रहे उँगलियों से वो लम्हे...
न जाने कहाँ खो गए वो लम्हे
थकी ज़िन्दगी में, सुहाने से लम्हे
गुज़रते हुए कारवां के वे लम्हे
हंसाते-रुलाते मचलते वो लम्हे
पिघलती हुई जिंदगानी के लम्हे
मिलन के वो लम्हे, बिछड़ने के लम्हे
भुलाने के लम्हे, निभाने के लम्हे
कोई आस ले कर लुभाने के लम्हे
कभी खो गए, मिल गए थे जो लम्हे
न जाने कहाँ खो गए थे वो लम्हे
पकड़ से फिसलते गए वो लम्हे
हथेली में ले कर चले चंद लम्हे
फिसलते रहे उँगलियों से वो लम्हे...
वो सपनों के लम्हे, वो आंसू के लम्हे
वो हंसती-हुई भीगी पलकों के लम्हे न जाने कहाँ खो गए वो लम्हे
वो लम्हे याद आते हैं...
Thursday, February 21, 2013
Saturday, February 16, 2013
लेकिन शायद... यादें घर नहीं बदलतीं
कुछ पड़ाव छूट गए, छोड़ दिए..
जीवन ने एक पगडंडी दी, बढ़ते आये
अब लगता है कुछ भूल गए
एक खालीपन जो चुभता है
चप्पा- चप्पा ढूढ़ते रहतें हैं
कुछ पुराने ख्वाब, कुछ खोये हुए रिश्ते
लेकिन शायद...
यादें घर नहीं बदलतीं
जीवन ने एक पगडंडी दी, बढ़ते आये
अब लगता है कुछ भूल गए
एक खालीपन जो चुभता है
चप्पा- चप्पा ढूढ़ते रहतें हैं
कुछ पुराने ख्वाब, कुछ खोये हुए रिश्ते
लेकिन शायद...
यादें घर नहीं बदलतीं
Wednesday, February 06, 2013
जीवन यूं ही चलता रहता... ढलता रहता!
सूरज वैसे ही उगता है
धड़कन वैसी ही चलती है
मौसम बदला, पत्ते टूटे
फिर नयी कोपलें खिलती हैं
जीवन यूं ही चलता रहता... ढलता रहता!
अपनी खिड़की पर बैठा मैं
ऊँगली में थामे सिगरेट को
तकता रहता हूँ वही सड़क
जिस से इतिहास गुज़र जाता
जीवन यूं ही चलता रहता... ढलता रहता!
कुछ बदल गया पर वही रहा
साँसे वैसी ही चलती हैं
हर दिन एक सूरज ढलता है
हर दिन एक सूरज उगता है
जीवन यूं ही चलता रहता... ढलता रहता!
लेकिन इस बहते जीवन की
धड़कन की यति में कभी-कभी
सूरज के ढलने-उगने में
इक सन्नाटा, इक खोमोशी
इक अन्धकार, खोयी यादें!!
लेकिन फिर भी...
जीवन यूं ही चलता रहता... ढलता रहता!
धड़कन वैसी ही चलती है
मौसम बदला, पत्ते टूटे
फिर नयी कोपलें खिलती हैं
जीवन यूं ही चलता रहता... ढलता रहता!
अपनी खिड़की पर बैठा मैं
ऊँगली में थामे सिगरेट को
तकता रहता हूँ वही सड़क
जिस से इतिहास गुज़र जाता
जीवन यूं ही चलता रहता... ढलता रहता!
कुछ बदल गया पर वही रहा
साँसे वैसी ही चलती हैं
हर दिन एक सूरज ढलता है
हर दिन एक सूरज उगता है
जीवन यूं ही चलता रहता... ढलता रहता!
लेकिन इस बहते जीवन की
धड़कन की यति में कभी-कभी
सूरज के ढलने-उगने में
इक सन्नाटा, इक खोमोशी
इक अन्धकार, खोयी यादें!!
लेकिन फिर भी...
जीवन यूं ही चलता रहता... ढलता रहता!
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