Tuesday, April 24, 2012

...शून्य बन कर ही रहूँगा ||

I guess these verses, back then in '73, came out of that sense of growing out of childhood into being an adult.. when one experiences so many parts of oneself dying...
(and it takes a few decades to discover/ realise that in the 'river' nothing remains the same - and everything returns...)

मृत्यु में ही मुक्ति मेरी,
...शून्य बन कर ही रहूँगा||

भोर आंसू की कहानी
जलाती दिन की जवानी
थका, ऊबा शाम का तन
रात, दुःख में डूबता मन
है यही जीवन अगर तो,
भार कब तक सह सकूंगा...
...शून्य बन कर ही रहूँगा ||

चीखतीं साड़ी दिशाएँ
झटक देती हैं हवाएं
भटकता हूँ, मार्ग ओझिल
घेर लेते सिसकते पल,
खो गया पथ, दिशा धूमिल
भटकता कब तक रहूँगा
...शून्य बन कर ही रहूँगा ||
- Dec 3, '73 (Lucknow)


Ajju said...

Must have been written in a very dismal state of mind :-) But captures the helplessness so well...

मुकेश पाण्डेय चन्दन said...

बहुत सुन्दर .........सोचने को मजबूर कर दे !