Saturday, March 20, 2010

A life woven around couplets and poems...

Today, I (re-)discovered a very very old diary, which I used to keep, when I was growing up - and in which I used to scribble down things - quotes, poems, couplets (शेर ) which I would come across (in books, magazines, conversations with friends/co-travellers of my life, songs, etc.), and which would help me to make sense of my own scattered life...

Reading those, I also realised the influence they had on my mid/late teenage mind, and - for good or bad - molded me as a person... at least, gave me a sense of meaning to those numerous things which happen to you when you are - with very inadequate capabilities- trying to find 'what the hell this is all about!'

Some, I still remember, but many of these personal roots I had forgotten till today I re-discovered them...

...in some ways, this post is to acknowledge those many unknown poets/ शायरs who were with me when I was growing up

Here are some - maybe 2-10% - of those couplets (from amongst the hundreds, which are there in the diary)... in no particular order - each of them was a part of 'sense-making' :

उगां कि मुझ ग़रीब को, हयात का ये हुक्म है,
समझ हरेक राज़ को, मगर फरेब खाए जा।
***

मंजिल मुझे मिले ना मिले, इसका ग़म नहीं,
मंजिल कि जुस्तजू में मेरा कारवां तो है।
***

कुच्छ ग़म नहीं कि उनकी निगाह-ऐ करम नहीं,
हम भी अलग हैं, अपना मुकद्दर लिए हुए।
***

एक बार ही जीने कि सजा क्यूँ नहीं देते,
गर हर्फ़ गलत हूँ तो मिटा क्यूं नहीं देते।
मोती हो तो यूं पास ना रखने का सबब क्या,
पत्थर हूँ तो रस्ते से हटा क्यूं नहीं देते॥
***

जो सोचिये तो बहुत सिलसिले, बहुत रिश्ते,
जो देखिये तो जहाँ में, हर आदमी तनहा।
***

कहना चाहा तो मगर बात बनायीं ना गयी,
दर्द को शब्द में पोशाक पिन्हाई ना गयी।
और फिर ख़त्म हुयी ऐसे कहानी अपनी,
उनसे सुनते ना गयी, हमसे सुनाई ना गयी॥
***

गए हैं हम भी गुलिस्तान में बारहा लेकिन,
कभी बहार के पहले, कभी भार के बाद।
***

भटकने कि आदत सी कुच्छ पड़ गयी है,
कई बार मंजिल ने हमको पुकारा।
***

ऐ मौजे हवा! दे इनको भी,
दो-चार थपेड़े हलके से।
कुछ लोग अभी भी साहिल से,
तूफाँ का नज़ारा करते हैं॥
***

डूबने वाले ये किनारे पर क्यूँ-कर है,
मौत आई तो किनारे पे भी मर जाएगा।
***

मेरी ज़िन्दगी वोह मसल्सल सफ़र है,
कि मंजिल पे पहुंचे तो मंजिल बढ़ा दी।
***

ऐ आसमान, तेरे खुदा का नहीं है खौफ,
डरते हैं ऐ ज़मीन, तेरे आदमी से हम।
****

पुरानी और नयी रौशनी में फर्क इतना है,
उन्हें मंजिल नहीं मिलती, इन्हें साहिल नहीं मिलता।
***

हमें खबर है कि हम हैं, चिराग-ऐ-आखिरी-शब्,
हमारे बाद अँधेरा नहीं उजाला है।
***

अगर जाना है तुमको पार
बहुत है तिनके का आधार।
और मत सोचो मेरे मीत,
कहेगा क्या तट से संचार॥
***

रागिनी एक थी आंसू की मेरी उम्र मगर,
रही जहाँ भी वहां, रौशनी लुटा के रही।
और जब ख़त्म हुयी मेरी कहानी जग में,
आधी दीपक नें कही, आधी पतंगे नें कही॥

... and of course, that was also an age when it is natural to keep falling in love :)... so there were an equal number of romantic couplets too :0)... in some other posting later...

3 comments:

DC said...

loved the one on "purani and nayi roshni" :) So true!

rajee said...

sir, tussi te great ho. sir kal S.E. class mein rubaru sunae toh lajawab ho jaega.

javieth said...

Every poem demostrates the love, compassion and good will human being. In fact i read a wonderful poem few time ago. I really loved. That´s why i think this blog is very interesting, most of all for the people who enjoy the poems. I saw
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