Saturday, February 06, 2010

स्वयं को खोया, स्वयं का सार पाने के लिए - २

स्वयं को खोया स्वयं का सार पाने के लिए - १...
स्वयं को खोया,
स्वयं का सार पाने के लिए...

जब प्रणय की अर्चना में
कामना के गीत उगते,
जब कृत्रिम जग की प्रथा में
सांस के पग जा उलझते,
जब ह्रदय की वासना
जीवन-दिशायें खीचती थी,
पूछती थी अर्थ अपना,
व्यर्थ-सी स्मृति उभर के...
...क्या चले थे हम यही संसार पाने के लिए...

भटकने देते स्वयं को,
उस भटकने में दिशा थी,
उलझती पगडंडियों में
भटकना जीवन-प्रथा थी,
मार्ग ही गंतव्य था, चलना
स्वयं में ध्येय था,
मिलने-बिछुड़ने की अधूरी
तृप्ति में, संत्रिप्ता थी...
...भटकता था प्यार भी जब प्यार पाने के लिए...

1 comment:

Bunty said...

can so much relate to myself and my life here at XL! hats off!